गज गिरा¸ मरा¸ पिलवान गिरा¸

हय कटकर गिरा¸ निशान गिरा।

कोई लड़ता उत्तान गिरा¸

कोई लड़कर बलवान गिरा॥

 

आँखों में भाला भोंक दिया

लिपटे अन्धे जन अन्धों से।

सिर कटकर भू पर लोट लोट

लड़ गये कबन्ध कबन्धों से॥

 

 

राणा प्रताप का ताप तचा¸

अरि–दल में हाहाकर मचा।

भेड़ों की तरह भगे कहते

अल्लाह हमारी जान बचा॥

 

अपनी नंगी तलवारों से

वे आग रहे हैं उगल कहाँ।

वे कहाँ शेर की तरह लड़ें¸

हम दीन सिपाही मुगल कहाँ॥॥

 

भयभीत परस्पर कहते थे

साहस के साथ भगो वीरो!

पीछे न फिरो¸ न मुड़ो¸ न कभी

अकबर के हाथ लगो वीरो॥

 

 

पहले सरिता को देख डरे¸

फिर कूद–कूद उस पार भगे।

कितने बह–बह इस पार लगे¸

कितने बहकर उस पार लगे॥

 

मंझधार तैरते थे कितने¸

कितने जल पी–पी ऊब मरे।

लहरों के कोड़े खा–खाकर

कितने पानी में डूब मरे॥

 

राणा–दल की ललकार देख¸

अपनी सेना की हार देख।

सातंक चकित रह गया मान¸

राणा प्रताप के वार देख॥

 

व्याकुल होकर वह बोल उठा

"लौटो लौटो न भगो भागो।

मेवाड़ उड़ा दो तोप लगा

ठहरो–ठहरो फिर से जागो॥

 

देखो आगे बढ़ता हूँ मैं¸

बैरी–दल पर चढ़ता हूँ मैं।

ले लो करवाल बढ़ो आगे

अब विजय–मन्त्र पढ़ता हूँ मैं||

 

भगती सेना को रोक तुरत

लगवा दी भौरव–काय तोप।

उस राजपूत–कुल–घातक ने

हा¸ महाप्रलय–सा दिया रोप॥

 

फिर लगी बरसने आग सतत्

उन भीम भयंकर तोपों से।

जल–जलकर राख लगे होने

योद्धा उन मुगल–प्रकोपों से॥55॥

 

भर रक्त–तलैया चली उधर¸

सेना–उर में भर शोक चला।

जननी–पद शोणित से धो–धो

हर राजपूत हर–लोक चला।

 

क्षणभर के लिये विजय दे दी

अकबर के दारूण दूतों को।

माता ने अंचल बिछा दिया

सोने के लिए सपूतों को॥

 

विकराल गरजती तोपों से

रूई–सी क्षण–क्षण धुनी गई।

उस महायज्ञ में आहुति–सी

राणा की सेना हुनी गई॥

 

बच गये शेष जो राजपूत

संगर से बदल–बदलकर रूख।

निरूपाय दीन कातर होकर

वे लगे देखने राणा–मुख॥

 

राणा–दल का यह प्रलय देख¸

भीषण भाला दमदमा उठा।

जल उठा वीर का रोम–रोम¸

लोहित आनन तमतमा उठा॥

 

वह क्रोध वह्नि से जल भुनकर

काली–कटाक्ष–सा ले कृपाण।

घायल नाहर–सा गरज उठा

क्षण–क्षण बिखेरते प्रखर बाण॥

 

बोला "आगे बढ़ चलो शेर¸

मत क्षण भर भी अब करो देर।

क्या देख रहे हो मेरा मुख

तोपों के मुँह दो अभी फेर।"॥

 

बढ़ चलने का सन्देश मिला¸

मर मिटने का उपदेश मिला।

"दो फेर तोप–मुख्" राणा से

उन सिंहों को आदेश मिला||

 

गिरते जाते¸ बढ़ते जाते¸

मरते जाते चढ़ते जाते।

मिटते जाते¸ कटते जाते¸

गिरते–मरते मिटते जाते॥

 

बन गये वीर मतवाले थे

आगे वे बढ़ते चले गये।

राणा प्रताप की जय करते

तोपों तक चढ़ते चले गये॥

 

उन आग बरसती तोपों के

मुँह फेर अचानक टूट पड़े।

बैरी–सेना पर तड़प–तड़प

मानों शत–शत पत्रि छूट पड़े॥

 

फिर महासमर छिड़ गया तुरत

लोहू–लोहित हथियारों से।

फिर होने लगे प्रहार वार

बरछे–भाले तलवारों से॥

 

शोणित से लथपथ ढालों से¸

करके कुन्तल¸ करवालों से¸

खर–छुरी–कटारी फालों से¸

भू भरी भयानक भालों से॥

 

गिरि की उन्नत चोटी से

पाषाण भील बरसाते।

अरि–दल के प्राण–पखेरू

तन–पिंजर से उड़ जाते॥

 

कोदण्ड चण्ड–रव करते

बैरी निहारते चोटी।

तब तक चोटीवालों ने

बिखरा दी बोटी–बोटी॥70॥

 

अब इसी समर में चेतक

मारूत बनकर आयेगा।

राणा भी अपनी असि का¸

अब जौहर दिखलायेगा॥71॥

 

निर्बल बकरों से बाघ लड़े¸

भिड़ गये सिंह मृग–छौनों से।

घोड़े गिर पड़े गिरे हाथी¸

पैदल बिछ गये बिछौनों से॥

 

हाथी से हाथी जूझ पड़े¸

भिड़ गये सवार सवारों से।

घोड़ों पर घोड़े टूट पड़े¸

तलवार लड़ी तलवारों से॥

 

हय–रूण्ड गिरे¸ गज–मुण्ड गिरे¸

कट–कट अवनी पर शुण्ड गिरे।

लड़ते–लड़ते अरि झुण्ड गिरे¸

भू पर हय विकल बितुण्ड गिरे॥

 

क्षण महाप्रलय की बिजली सी¸

तलवार हाथ की तड़प–तड़प।

हय–गज–रथ–पैदल भगा भगा¸

लेती थी बैरी वीर हड़प॥

 

क्षण पेट फट गया घोड़े का¸

हो गया पतन कर कोड़े का।

भू पर सातंक सवार गिरा¸

क्षण पता न था हय–जोड़े का॥

 

चिंग्घाड़ भगा भय से हाथी¸

लेकर अंकुश पिलवान गिरा।

झटका लग गया¸ फटी झालर¸

हौदा गिर गया¸ निशान गिरा॥

 

कोई नत–मुख बेजान गिरा¸

करवट कोई उत्तान गिरा।

रण–बीच अमित भीषणता से¸

लड़ते–लड़ते बलवान गिरा॥

 

होती थी भीषण मार–काट¸

अतिशय रण से छाया था भय।

था हार–जीत का पता नहीं¸

क्षण इधर विजय क्षण उधर विजय॥

 

कोई व्याकुल भर आह रहा¸

कोई था विकल कराह रहा।

लोहू से लथपथ लोथों पर¸

कोई चिल्ला अल्लाह रहा॥

 

धड़ कहीं पड़ा¸ सिर कहीं पड़ा¸

कुछ भी उनकी पहचान नहीं।

शोणित का ऐसा वेग बढ़ा¸

मुरदे बह गये निशान नहीं॥

 

मेवाड़–केसरी देख रहा¸

केवल रण का न तमाशा था।

वह दौड़–दौड़ करता था रण¸

वह मान–रक्त का प्यासा था॥

 

चढ़कर चेतक पर घूम–घूम

करता मेना–रखवाली था।

ले महा मृत्यु को साथ–साथ¸

मानो प्रत्यक्ष कपाली था॥

 

रण–बीच चौकड़ी भर–भरकर

चेतक बन गया निराला था।

राणा प्रताप के घोड़े से¸

पड़ गया हवा को पाला था॥

 

गिरता न कभी चेतक–तन पर¸

राणा प्रताप का कोड़ा था।

वह दोड़ रहा अरि–मस्तक पर¸

या आसमान पर घोड़ा था॥

 

जो तनिक हवा से बाग हिली¸

लेकर सवार उड़ जाता था।

राणा की पुतली फिरी नहीं¸

तब तक चेतक मुड़ जाता था॥

 

कौशल दिखलाया चालों में¸

उड़ गया भयानक भालों में।

निभीर्क गया वह ढालों में¸

सरपट दौड़ा करवालों में॥

 

है यहीं रहा¸ अब यहाँ नहीं¸

वह वहीं रहा है वहाँ नहीं।

थी जगह न कोई जहाँ नहीं¸

किस अरि–मस्तक पर कहाँ नहीं।

 

 

बढ़ते नद–सा वह लहर गया¸

वह गया गया फिर ठहर गया।

विकराल ब्रज–मय बादल–सा

अरि की सेना पर घहर गया॥

 

भाला गिर गया¸ गिरा निषंग¸

हय–टापों से खन गया अंग।

वैरी–समाज रह गया दंग

घोड़े का ऐसा देख रंग॥

 

चढ़ चेतक पर तलवार उठा

रखता था भूतल–पानी को।

राणा प्रताप सिर काट–काट

करता था सफल जवानी को॥

 

कलकल बहती थी रण–गंगा

अरि–दल को डूब नहाने को।

तलवार वीर की नाव बनी

चटपट उस पार लगाने को॥

 

वैरी–दल को ललकार गिरी¸

वह नागिन–सी फुफकार गिरी।

था शोर मौत से बचो¸बचो¸

तलवार गिरी¸ तलवार गिरी॥

talvaar

पैदल से हय–दल गज–दल में

छिप–छप करती वह विकल गई!

क्षण कहाँ गई कुछ¸ पता न फिर¸

देखो चमचम वह निकल गई॥

 

क्षण इधर गई¸ क्षण उधर गई¸

क्षण चढ़ी बाढ़–सी उतर गई।

था प्रलय¸ चमकती जिधर गई¸

क्षण शोर हो गया किधर गई॥

 

क्या अजब विषैली नागिन थी¸

जिसके डसने में लहर नहीं।

उतरी तन से मिट गये वीर¸

फैला शरीर में जहर नहीं॥

 

थी छुरी कहीं¸ तलवार कहीं¸

वह बरछी–असि खरधार कहीं।

वह आग कहीं अंगार कहीं¸

बिजली थी कहीं कटार कहीं॥

 

लहराती थी सिर काट–काट¸

बल खाती थी भू पाट–पाट।

बिखराती अवयव बाट–बाट

तनती थी लोहू चाट–चाट॥

 

सेना–नायक राणा के भी

रण देख–देखकर चाह भरे।

मेवाड़–सिपाही लड़ते थे

दूने–तिगुने उत्साह भरे॥

 

क्षण मार दिया कर कोड़े से

रण किया उतर कर घोड़े से।

राणा रण–कौशल दिखा दिया

चढ़ गया उतर कर घोड़े से॥

 

क्षण भीषण हलचल मचा–मचा

राणा–कर की तलवार बढ़ी।

था शोर रक्त पीने को यह

रण–चण्डी जीभ पसार बढ़ी॥

 

वह हाथी–दल पर टूट पड़ा¸

मानो उस पर पवि छूट पड़ा।

कट गई वेग से भू¸ ऐसा

शोणित का नाला फूट पड़ा॥

 

जो साहस कर बढ़ता उसको

केवल कटाक्ष से टोक दिया।

जो वीर बना नभ–बीच फेंक¸

बरछे पर उसको रोक दिया॥

 

क्षण उछल गया अरि घोड़े पर¸

क्षण लड़ा सो गया घोड़े पर।

वैरी–दल से लड़ते–लड़ते

क्षण खड़ा हो गया घोड़े पर॥

 

क्षण भर में गिरते रूण्डों से

मदमस्त गजों के झुण्डों से¸

घोड़ों से विकल वितुण्डों से¸

पट गई भूमि नर–मुण्डों से॥

 

ऐसा रण राणा करता था

पर उसको था संतोष नहीं

क्षण–क्षण आगे बढ़ता था वह

पर कम होता था रोष नहीं॥

 

कहता था लड़ता मान कहाँ

मैं कर लूँ रक्त–स्नान कहाँ।

जिस पर तय विजय हमारी है

वह मुगलों का अभिमान कहाँ॥

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